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लुप्त होती हरियाणा की अनमोल विरासत रागनी कला

 हरियाणवी लोकसंस्कृति का एक महत्त्वपूर्ण अंग रागनी आज विलुप्ति के कगार पर है। मनोरंजन के आधुनिक साधनों के आगमन और बदलते सामाजिक परिवेश के कारण यह कला पिछड़ती जा रही है। यदि समय रहते इसके संरक्षण के प्रयास नहीं किए गए, तो आने वाली पीढ़ियों को यह विरासत केवल किताबों में ही देखने को मिलेगी। रागनी के लुप्त होने का मुख्य कारण आधुनिक जीवनशैली, व्यवसायिक कमी और नई पीढ़ी की बदलती रुचि है। इसे बचाने के लिए डिजिटल प्लेटफार्मों पर प्रचार, शिक्षा में लोककला को शामिल करना और लोक कलाकारों को आर्थिक सहयोग देना ज़रूरी है। यदि सही क़दम नहीं उठाए गए, तो यह अनमोल धरोहर धीरे-धीरे गुम हो जाएगी।


-डॉ. सत्यवान सौरभ


हरियाणा की लोकसंस्कृति में रागनी एक महत्त्वपूर्ण कला है, जो समय के साथ धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही है। यह न केवल मनोरंजन का माध्यम रही है, बल्कि सामाजिक संदेश देने, वीर रस जगाने और लोक इतिहास को संजोने का एक प्रभावशाली ज़रिया भी रही है। हरियाणा की रागनी न केवल मनोरंजन का एक सशक्त माध्यम रही है, बल्कि समाज सुधार की दिशा में भी इसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। यह लोककला सिर्फ़ संगीत नहीं, बल्कि एक आंदोलन रही है, जिसने लोगों को जागरूक किया, बुराइयों के खिलाफ खड़ा किया और समाज को एक नई दिशा देने का प्रयास किया। हरियाणवी रागनी लोकसंस्कृति का अभिन्न अंग रही है और इसके प्रचार-प्रसार में जाहरवीर कल्लू खां, अजीत सिंह गोरखपुरिया, दयाचंद लांबा, राजेंद्र खड़खड़ी, जसमेर खरकिया, सुरेंद्र भादू, सूरजभान बलाली, मामन खान, सतीश ठेठ, कविता कसाना के साथ-साथ और भी कई महान कलाकारों का योगदान रहा है। आज भी कई युवा कलाकार रागनी को आगे बढ़ा रहे हैं और इसे डिजिटल मंचों के माध्यम से नई ऊँचाइयों तक ले जाने का प्रयास कर रहे हैं। हरियाणवी रागनी को जीवित रखने में संदीप सरगथलिया, वीर सिंह फौजी, धर्मवीर नागर, राजबाला, मास्टर छोटूराम बड़वा जैसे कई कलाकारों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। इनकी मेहनत और समर्पण से यह लोककला आज भी जीवित है, हालाँकि इसे और संरक्षण और प्रोत्साहन की ज़रूरत है।

रागनी हरियाणवी लोकगीतों और कविताओं का एक विशिष्ट रूप है, जिसे मुख्य रूप से हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान के कुछ हिस्सों में गाया जाता है। इसमें वीरता, प्रेम, भक्ति, सामाजिक मुद्दों और ऐतिहासिक घटनाओं का चित्रण किया जाता है। पहले यह कला अखाड़ों और मेलों में बहुत लोकप्रिय थी, जहाँ गायक अपनी आवाज़ और जोश के साथ लोगों को मंत्रमुग्ध कर देते थे। रागनी के माध्यम से महिलाओं के अधिकारों, शिक्षा और समानता पर ज़ोर दिया गया। कई लोकप्रिय रागनियों में बाल विवाह, दहेज प्रथा और महिलाओं पर अत्याचारों का विरोध किया गया है। "बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ" जैसे संदेशों को रागनी ने जन-जन तक पहुँचाया। हरियाणवी समाज में जातिगत भेदभाव को ख़त्म करने और समानता का संदेश देने में रागनी की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। कई प्रसिद्ध रागनियों ने बताया कि सभी मनुष्य समान हैं और कर्म को जाति से ऊपर रखना चाहिए। रागनी के माध्यम से शराब, जुए और अन्य नशों की लत से बचने के संदेश दिए गए। कलाकारों ने इन बुराइयों को जड़ से उखाड़ने के लिए प्रेरक गीत गाए। उदाहरण: "सुणले रे छोरे, बीड़ी-सिगरेट मत पीजा, तन्ने मां-बाप सूँ किट्टे तै प्यारा" (एक रागनी जिसमें धूम्रपान के नुक़सान बताए गए हैं) । हरियाणा की ग्रामीण जनता के लिए रागनी एक ताकत बनी। इसमें किसानों की समस्याओं, मजदूरों के अधिकारों और सरकार से उनकी माँगों को जोरदार तरीके से उठाया गया। उदाहरण: कई रागनियों में किसान आंदोलनों, फ़सल के सही दाम और सरकार की नीतियों पर सवाल उठाए गए हैं।

ब्रिटिश राज के दौरान रागनी स्वतंत्रता सेनानियों के लिए एक प्रभावशाली हथियार बनी। लोकगायक अपनी रचनाओं के माध्यम से जनता में देशभक्ति की भावना भरते थे और अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह का आह्वान करते थे। आज के दौर में भी रागनी समाज सुधार का माध्यम बनी हुई है। डिजिटल मीडिया और मंचों पर युवा कलाकार सामाजिक मुद्दों पर रागनी प्रस्तुत कर रहे हैं। हरियाणवी लोकसंस्कृति की पहचान रागनी समय के साथ लुप्त होती जा रही है। कभी गाँवों के चौपालों, मेलों और अखाड़ों में गूँजने वाली यह कला अब केवल कुछ पुराने कलाकारों और रसिकों तक सीमित रह गई है। इसके लुप्त होने के पीछे कई सामाजिक, सांस्कृतिक और तकनीकी कारण ज़िम्मेदार हैं। पहले के समय में गाँवों में बैठकर बुज़ुर्ग अपनी अगली पीढ़ी को लोकगीत और रागनी सिखाते थे, लेकिन अब यह परंपरा समाप्त हो रही है। लोकगीतों और रागनी को नयी शैली में ढालने का प्रयास कम हुआ है, जिससे यह लोगों के लिए कम प्रासंगिक हो गई है। नवीन मनोरंजन साधनों टीवी, इंटरनेट और पॉप संस्कृति के बढ़ते प्रभाव के कारण युवा पीढ़ी लोककला से दूर होती जा रही है। आधुनिक संगीत उद्योग में रागनी को वह स्थान नहीं मिला जो अन्य संगीत शैलियों को मिला है। युवा पीढ़ी इसे करियर के रूप में अपनाने के लिए प्रेरित नहीं हो रही है। इस कला को संरक्षित करने के लिए कोई औपचारिक संस्थान या पाठ्यक्रम उपलब्ध नहीं हैं।

रागनी को नए संगीत वाद्ययंत्रों और आधुनिक ध्वनि तकनीक के साथ प्रस्तुत किया जाए, ताकि यह युवाओं को भी आकर्षित कर सके। हरियाणवी फ़िल्म और म्यूजिक इंडस्ट्री में रागनी को स्थान दिया जाए। रागनी को रैप और हिप-हॉप जैसी आधुनिक शैलियों के साथ मिलाकर फ्यूज़न रागनी तैयार की जाए, जिससे यह युवाओं तक प्रभावी रूप से पहुँचे। हरियाणवी लोकसंस्कृति का एक महत्त्वपूर्ण अंग रागनी आज विलुप्ति के कगार पर है। मनोरंजन के आधुनिक साधनों के आगमन और बदलते सामाजिक परिवेश के कारण यह कला पिछड़ती जा रही है। यदि समय रहते इसके संरक्षण के प्रयास नहीं किए गए, तो आने वाली पीढ़ियों को यह विरासत केवल किताबों में ही देखने को मिलेगी। स्कूलों और कॉलेजों में रागनी को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाए, ताकि युवा पीढ़ी इसकी जड़ों से जुड़ सके। विश्वविद्यालयों में लोककला और संगीत की पढ़ाई के अंतर्गत रागनी पर शोध को बढ़ावा दिया जाए। बच्चों को पारंपरिक संगीत में रुचि दिलाने के लिए सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएँ। सरकार और सांस्कृतिक संस्थानों को लोक महोत्सवों में रागनी को विशेष स्थान देना चाहिए। यूट्यूब, पॉडकास्ट और सोशल मीडिया के माध्यम से इसे युवाओं तक पहुँचाया जा सकता है। स्कूलों और कॉलेजों में रागनी की शिक्षा दी जानी चाहिए। लोक कलाकारों को आर्थिक और सामाजिक समर्थन दिया जाना चाहिए।

रागनी केवल एक गीत शैली नहीं, बल्कि हरियाणा की संस्कृति की पहचान है। यदि इसे संरक्षित करने के लिए उचित क़दम नहीं उठाए गए, तो यह अमूल्य धरोहर धीरे-धीरे विलुप्त हो जाएगी। अब समय आ गया है कि हम इसे फिर से लोकप्रिय बनाएँ और इसकी समृद्ध परंपरा को आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाएँ। रागनी केवल लोकगायन नहीं, बल्कि समाज को जागरूक करने का सशक्त माध्यम है। यह सामाजिक बुराइयों के खिलाफ आवाज़ उठाने, सुधार की ओर प्रेरित करने और बदलाव लाने की ताकत रखती है। अगर इसे सही दिशा में प्रोत्साहित किया जाए, तो यह समाज सुधार की एक मज़बूत नींव बन सकती है। "रागनी सिर्फ़ गीत नहीं, ये समाज की आवाज़ है!" , "लोककला हमारी पहचान है, इसे बचाना हमारी शान है!"


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- डॉo सत्यवान सौरभ,

कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, आकाशवाणी एवं टीवी पेनालिस्ट,


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