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उत्तर प्रदेश में ईवीएम द्वारा घोटाले से बनी सरकार के समर्थकों का शुरू हो गया आतंक मस्जिदों से लाउडस्पीकर हटाने के नारे बुलंद निंदनीय लोकतंत्र पर हमला--गादरे*

  दिल्ली:-13 अगस्त 1980, ईद का दिन। मुरादाबाद की ईदगाह में नमाज पढते हजारो मुसलमानो पर पीएसी ने गोलियां बरसाई। चार सौ से ज्यादा मुसलमानो की मौत। उस पर मूवी क्यों नही ? 18 फरवरी 1983 आसाम के नेली मे दस हजार से ज्यादा मुसलमानो की हत्या पुलिस और दंगाईयो ने मिलकर की। उस पर मूवी क्यों नही ?


21 मई 1987 मेरठ के हाशिमपुरा मोहल्ले मे पचास मुसलमानो को पीएसी ने जंगल मे ले जाकर एक नहर के किनारे लाईन मे खडा करके गोली मारी। उस पर मूवी क्यों नही ? 1984 मे दिल्ली रेल्वे स्टेशन पर साठ सिख फौजियों को बोगी से निकालकर, केरोसिन डालकर भीड ने जला दिया । शूद्रों की मूवी को क्यों नहीं सो गया जा रहा आज तक ब्राह्मणों द्वारा 4000 साल से पिछड़ी जातियों पर अनेक अत्याचार किए जा रहे हैं और बैंडिट क्वीन माननीय फूलन देवी की मूवी को क्यों नहीं चलने दिया आज एससी एसटी ओबीसी माइनॉरिटी पर टुकड़ों टुकड़ों में हमले किए जा रहे हैं उधर इस्लामोफोबिया जबरदस्त तरीके को देखने को मिल रहा है क्या यही प्रधानमंत्री मुख्यमंत्री राज्यपाल उपराष्ट्रपति के होते हुए एक लोकतंत्र में ऐसा संभव है? उस पर मूवी क्यों नही ? पण्डितों को 8 साल मे भी घर वापसी नहीं करा पाए मोदी।                            बहुजन मुक्ति पार्टी के बहुजन मुक्ति पार्टी के आर डी गादरे ने अपने वक्तव्य में कहा कि भारत लोकतंत्र होते हुए भी भारत में आज इस्लामोफोबिया के बढ़ते हुए कदम अफसोस जनक और उत्तर प्रदेश में ईवीएम द्वारा घोटाले से बनी सरकार के समर्थकों का शुरू हो गया आतंक मस्जिदों से लाउडस्पीकर हटाने के नारे सरेआम बुलंद करना निंदनीय लोकतंत्र सीधे तौर पर हमला है इतिहास गवाह है कि कश्मीर और आस पास के रास्ते से तुर्क आए. अफ़ग़ान आए, मुग़ल आए। 400 साल से ज़्यादा समय तक कश्मीर में  मुसलमान शासक रहे। लेकिन कश्मीरी पंडित कश्मीर में बने रहे। 

वे कश्मीरी पंडित कश्मीर घाटी के सबसे अमीर समुदाय के तौर पर रहे। लगभग सारी ज़मीन इनके पास थी। शिक्षा में सबसे ऊँचा स्तर इनका था। कश्मीरी पंडित पी एम, नौकरशाह और जज बन रहे थे। 

फिर 1990 में ऐसा क्या हुआ कि उन्हें अपना घर छोड़ना पड़ा? राज्य का शासन उस समय जगमोहन चला रहे थे। ज्ञात कीजिए कि उस वक्र्त राज्य सरकार बर्खास्त थी। केंद्र की सरकार बीजेपी के समर्थन से चल रही थी।

जो लोग तुर्क, अफ़ग़ान और मुग़ल के साथ एडजस्ट कर गए, फूलते-फलते रहे, वो जगमोहन के समय घर छोड़कर चले गए? उस वक्त ब्राह्मण जो काम किया करते थे उनके व्यापार ना के बराबर हुए क्योंकि ऊंच-नीच की व्यवस्था फैलाने का षड्यंत्र या पूजा पाठ का वहां नहीं चल पा रहा था क्योंकि लोग मुस्लिम बनते चले गए और पूजा-पाठ छोड़ कर के एक ईश्वर खुदा को मानने वाले बन गए और ब्राह्मणों को पूरे भारत में अपने व्यापार को लेकर फैल गए और आज कश्मीर से ज्यादा बड़ी प्रॉपर्टी बड़े पैसे वाले बने हुए हैं। क्योंकि केंद्र सरकार ने उन लोगों को जमीन जायदाद भरपूर मात्रा में मुहैया कराई और दिल्ली में पंपोश एनक्लेव में ही देख सकते हैं कि एक फ्लैट की कीमत 15 से ₹20 करोड की कीमत वाले घरों मे रह रहे है? और कश्मीर में रह रहे लोगों की दुर्दशा सभी के सामने है। भारत देश में गुर्जर धोबी तेली माली ना जुलाहा बढ़ाई लोहार पिछडी जाति सवर्ण और जो व्यवस्था के शिकार थे पाखंडवाद, अंधविश्वास के मूर्ति पूजा पत्थर पूजा ऊंच-नीच असमानता के उन लोगों ने मुस्लिम धर्म अपनाया कुछ सीख अपनाएं कुछ सिख अपनाएं कुछ ईसाई तो कोई लिंगायत अपनाएं जहां जिस विचारधारा का प्रचार प्रसार अच्छा लगा लोगों को सही लगा तो उन्होंने धर्म परिवर्तन किया भारत में ज्यादातर ही नहीं 87% करीब मूल निवासी हैं खून के भाई हैं लेकिन कुछ षड्यंत्रकारी आज भी एक दूसरे को मंदिर मस्जिद में उलझा कर देश को विज्ञान की और ना ले जाकर विकास की ओर ना ले जाकर देश को बेचने का काम कर रहे हैं। जनता को समझना होगा और तभी हमारा देश षड्यंत्रकारिर्यों से षड्यंत्रकारी सरकारों से बच पाएगा वरना गुलामी में कोई कमी और कसर बाकी नहीं रह गई है जो लोग मस्जिदों के माइक या मुस्लिम समाज को चोर उचक्का कहने से गुरेज नहीं कर रहे हैं तो वह अपने गिरेबान में झांके कि वह व्यवस्था सुधारने में क्यों वक्त नहीं लगा रहे हैं कौन सा मजहब कहता है कि मारकाट मचाओ आतंकवाद फैलाव यदि कोई गुनहगार है कोई आतंकवाद फैला रहा है तो उनको भी सजा मिलनी चाहिए यही लोकतंत्र है। और लोकतंत्र में सभी लोगों को सभी मजहब को अपने-अपने विचारधारा पर रहकर अपने धार्मिक कार्य करने की स्वतंत्रता मौजूद है एक युग जिसको सतयुग कह रहे हैं उसमें केवल ब्राह्मणों को पढ़ने की आजादी थी फिर द्वापर युग आया उसमें ब्राह्मणों के साथ क्षत्रियों को पढ़ सकते थे त्रेतायुग मे ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य को भी लिखने-पढ़ने की आजादी मिली और आज जो लोग कलयुग कहते हैं डॉ बाबा भीमराव अंबेडकर साहब के संविधान के अनुसार जो आज लोकतंत्र जीवित है उसमें सभी जातियों को पढ़ने - लिखने की अपने काम करने की आजादी अपने स्वास्थ्य की देखभाल करने की आजादी मिली हुई है यदि ऐसा नहीं चाहिए तो उन षड्यंत्रकारिर्यों से सवाल करने की जरूरत है और अपने देश की शांति और व्यवस्था बनाकर प्रोग्रेस करने की जरूरत है तभी हमारा संविधान और लोकतंत्र और इंसानियत बच सकती है।

नरेंद्र मोदी के आठ साल के शासन के बावजूद उनकी वापसी भी नहीं हो पा रही है। क्यों?

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